पतझड़ के मौसम में बहारों का दिन आया...
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फिर निकले आंसू, खुशियों का पैगाम आया
मेरे अँधेरे घर में सूरज का सलाम आया...
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पूछ रहा हैं हर लम्हा मुझसे हिसाब
सूखे हुए ज़ख्म से क्यों खून आया...
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चलते रहना तो मुक़द्दर हैं मुसाफिर का
फिर ज़िन्दगी में क्यों ठराव आया...
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दिल कहता हैं, कह दूं दुनिया-ए-जहां को खुदा हाफिज़ रोमिल
मगर मेरे मित्र का अभी नहीं पैगाम आया...
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बहुत दिनों के बाद तू मुझको याद आया...
पतझड़ के मौसम में बहारों का दिन आया...
बहुत दिनों के बाद तू मुझको याद आया...
पतझड़ के मौसम में बहारों का दिन आया...
#रोमिल